पर्यावरण के लिए पेड़-पौधों का संरक्षण क्यों है जरूरी? पढ़िये पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र रावत का ये विशेष आलेख

पर्यावरण के लिए पेड़-पौधों का संरक्षण क्यों है जरूरी? पढ़िये पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र रावत का ये विशेष आलेख

पर्यावरण शब्द दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है। परि का अर्थ है ‘हमारे चारों ओर’ और आवरण का अर्थ है ‘जो हमें सभी जगह से घेरे हुए हैं’। जब भी इसकी बात होती है तो हमारा ध्यान एक स्वच्छ पर्यावरण की ओर जाता है। कोरोना महामारी में पर्यावरण की उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गई है।

पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए पेड़-पौधों का संरक्षण बहुत ही जरूरी है। राष्ट्रीय स्तर पर माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर्यावरण के क्षेत्र में निरंतर अतुलनीय कार्य कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवॉर्ड और सेरावीक वैश्विक ऊर्जा और पर्यावरण नेतृत्व पुरस्कार जैसे कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है। वे आगामी पीढ़ियों के लिए एक बेहतर धरती बनाना चाहते हैं और सामूहिक रूप से उन वनस्पतियों और जीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं जिनसे ये धरती फल-फूल रही है।

उत्तराखंड का मुख्यमंत्री रहते हुए जल संरक्षण व संवर्धन मेरी भी सर्वोच्च प्राथमिकता थी। हिमालय दिवस और लोकपर्व हरेला पर हमनें अपने राज्य में पर्यावरण बचाने के लिए कई कार्यक्रम किए। पर्यावरण संरक्षण का दायित्व हम सभी का है।

इसके संरक्षण के लिए यहां की संस्कृति, नदियों व वनों का संरक्षण जरूरी है। हमनें बड़े पैमाने पर प्रदेश में वृक्षारोपण के लिए कार्यक्रम किए और चार साल के कार्यकाल में इसे जन आंदोलन का रूप देते हुए समाज के सभी वर्ग, संगठन, पर्यावरणविद्द, बच्चे, बुजुर्ग, युवा, महिलाएं, छात्र, किसान व कामगारों के साथ मिलकर देवभूमि को ईको फ्रैंडली स्टेट बनाने के लिए हर साल एक करोड़ से अधिक पौधे लगाए।

पॉलिथीन के प्रयोग के साथ सिंगल यूज प्लास्टिक के प्रयोग को भी हमनें सख्ती से रोका और उत्तराखंड में प्लास्टिक और थर्माकोल के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया।

ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण स्थित विधानभवन को ई-विधानसभा बनाने के संकल्प के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए ई-कैबिनेट शुरू की गई। मा० प्रधानमंत्री ने कहा था कि स्वच्छता की तरह ही जल संरक्षण के लिए भी जन आंदोलन की शुरुआत होनी चाहिए। क्योंकि स्वच्छ प्राणवायु और साफ पानी, इन दोनों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए इस दिशा में हमने कई बेहतरीन प्रयास किए जिनके कारण करोड़ों लीटर जल संचय करने में हमनें सफलता हासिल की।

इस दौरान हजारों चाल खालों व जलकुंडों के निर्माण के साथ-साथ सैकड़ों चैकडैम और लाखों कंटूर ट्रैंच बनाए गए। प्रदेश में सरकोट, ल्वाली, थतकोट, तड़कताल, कोलिधेक और सूर्याधार जैसी महत्वपूर्ण झीलों का निर्माण इस दिशा में मेरे द्वारा उठाए गए कदमों में से एक हैं।

हल्द्वानी में बायोडायवर्सिटी पार्क और देहरादून में ‘आनंद वन’ के नाम से सुंदर सिटी फॉरेस्ट विकसित किया गया। वनों को आग से बचाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में पिरूल से बिजली उत्पादन की अधिक संभावनाओं को देखते हुए हमनें उत्तरकाशी जिले के डुंडा क्षेत्र में 25 किलोवाट क्षमता की पिरूल से विद्युत उत्पादन की पहली परियोजना को शुरू किया।

इससे विद्युत उत्पादन के अलावा जंगल की सतह से पिरूल एकत्रीकरण से आग का खतरा नहीं रहेगा तथा वन औषधि और जल स्रोतों को भी सुरक्षा मिलेगी। वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए हमनें माननीय प्रधानमंत्री जी के पदचिंहों पर चलते हुए सौर क्रांति का संकल्प लिया और पूरे प्रदेश में सौर ऊर्जा का खूब विस्तार किया।

हर घर को सौर क्रांति से जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना चलाई। प्रदेश की बंजर पड़ी जमीन पर चाय बागानी को बढ़ावा देने के साथ-साथ उत्तराखंड टी बोर्ड को गैरसैंण स्थानांतरित किया। इसके साथ हमनें रिवर फ्रंट डेवलपमेंट के तहत रिस्पना, बिंदाल, कोसी और अन्य नदियों के संरक्षण के लिए भी प्रयास किया ताकि आने वाले समय में ये अपने पुराने स्वरूप में आ सके।

हमनें अपने प्रदेश की जनता से आग्रह किया था कि विवाहोत्सव और अपने पित्रों की याद में प्रत्येक साल एक पौधा जरूर रोपें साथ ही वर्षाकाल में परिवार के हर सदस्य को एक-एक पौधा लगाने के लिए भी संदेश दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए शुद्ध हवा और पानी मिल सके।

हमनें पहाड़ों की रानी मसूरी में सभी हिमालयी राज्यों के मा० मुख्यमंत्रियों के साथ हिमालयन कांक्लेव का आयोजन कर के मसूरी संकल्प पारित किया था। इसमें उन सभी राज्यों के मा० मुख्यमंत्रियों व प्रतिनिधियों ने हिमालय के पर्यावरण के संरक्षण का संकल्प लिया था। हम लोग प्रकृति के बेहद नजदीक हैं।

अगर हम प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की परवाह नहीं करेंगे तो प्रकृति भी इस नुकसान की भरपाई भी दंड स्वरूप हमसे से ही करेगी। प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़ आना, अकाल पड़ना, अधिक वर्षा, भूस्खलन होना, भूकंप इसके कई उदाहरण देखे जा सकते हैं।

हमारे पूर्वजों ने वृक्षों को बचाने के लिए अनवरत प्रयास किये और हमारी पीढ़ी को स्वस्थ सुरक्षित पर्यावरण प्रदान करने में सहयोग किया। इसी तरह आने वाली पीढ़ी को अच्छा पर्यावरण देने के लिए हमें भी संकल्प लेना होगा।

हमारा जीवन स्वस्थ एवं सुरक्षित तभी होगा जब हमारी धरती हरी-भरी रहेगी और वातावरण स्वच्छ होगा। हमारे आज के यही प्रयास हमारी कल की पीढ़ियों के लिए वरदान साबित होंगे।

(पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र सिंह के फेसबुक पेज से साभार)

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