देहरादून। देहरादून में बीते 7 नवम्बर और 15 नवम्बर को कर्मचारी संगठनों ने प्रदर्शन किया। कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन बहाली की मांग कर रहे हैं। देशभर में पुरानी पेंशन की मांग पिछले 17 सालों से हो रही हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन उनके बुढ़ापे की लाठी की तरह है। जिससे वे रिटायमेंट के बाद अपने और अपने आश्रितों का गुजर बसर करते हैं। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि एनपीएस लागू कर सरकार ने उनके बुढ़ापे की लाठी छीनने का काम किया है, जो उन्हें कतई मंजूर नहीं है।
पेंशन पर पॉलिटिक्स
चुनाव का समय है। लिहाजा पेंशन पर भी पॉलिटिक्स शुरू हो गई है। पुरानी पेंशन की मांग पर कांग्रेस भी कर्मचारी संगठनों के समर्थन में आ गई है। कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कहते है कांग्रेस महसूस करती है कि पुरानी पेंशन की बहाली होनी चाहिए। लेकिन इस पर फैसला केन्द्र सरकार को लेना है। राज्यों और केन्द्र के पारस्परिक सहयोग के बिना यह योजना पुनः लागू करना कठिन है। लेकिन केन्द्र की भाजपा सरकार इस दिशा में कोई पहल करती नजर नहीं आ रही है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो वे विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेंजेंगे कि पुरानी पेंशन को बहाल करिए।
मौजूदा समय में केन्द्र और उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार है। प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी ने पुरानी पेंशन बहाली को लेकर कहा कि वे इस मामले में अन्य राज्यों का अध्ययन करेंगे। साथ ही पुरानी पेंशन का प्रस्ताव केन्द्र को भेजने का भरोसा दिया है।
भाजपा और कांग्रेस की पुरानी पेंशन की बहाली को लेकर एक नीति है। दोनों ही दल मानते हैं कि पुरानी पेंशन बहाली केन्द्र सरकार के हाथों में है। चूंकि प्रदेश और केन्द्र दोनों जगह भाजपा की सरकार है लिहाजा कांग्रेस इस पेंशन के मामले को लेकर भाजपा को कठघरे में खड़ा कर रही है। लेकिन पूर्व सीएम हरीश रावत भी मानते है कि पुरानी पेंशन की बहाली केन्द्र के द्वारा ही संभव है।
लेकिन पुरानी पेंशन बहाली मोर्चा से जुड़े कर्मचारी संगठन के पदाधिकारी कहते हैं कि पेंशन केन्द्र का नहीं राज्य का मामला है। राज्य सरकार इस मामले में केन्द्र को पत्र लिखने की बात कर रही जो कि कर्मचारियों को मूर्ख बनाने व बरगलाने का मात्र एक तरीका है। कर्मचारी नेता कहते है किसी भी सूरत में पुरानी पेंशन को केन्द्र व राज्य के बीच फुटबाल नहीं बनने दिया जाएगा।
यहां बताते चले कि पश्चिमी बंगाल देश का एकमात्र राज्य है जहां पुरानी पेंशन व्यवस्था अभी तक लागू है।
एनपीएस पर कर्मचारी इसलिए है मुखर
17 साल पहले नेशनल पेंशन सिस्टम लागू होने के बाद से ही सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल करने की मुहिम चला रहे है। विरोध में लाखों कर्मचारियों ने अभी तक एनपीएस नहीं अपनाया है। जिससे भविष्य में आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।
ओपीएस कर्मचारियों को ज्यादा भरोसा और सुरक्षा प्रदान करती है। इसमें सरकार की ओर से तय लाभ दिया जाता है।
1 जनवरी 2004 से एनपीएस लागू होने के पहले जब सरकारी कर्मचारी सेवानिवृत होता था तो उसके अंतिम वेतन की 50 फीसरी राशि निश्चित तौर पर पेंशन के रुप में मिलती थी। इस पर कर्मचारी के सेवाकाल का कोई असर नहीं पड़ता था। इसके अलावा ओपीएस में हर साल महंगाई भत्ते के रूप में बढ़ोतरी के साथ नया वेतन आयोग लागू होने पर भी बड़ा इजाफा होता है। ओपीएस धारक की मौत होने पर उसकी पत्नी या अन्य आश्रित को पेंशन मिलती है।
जबकि एनपीएस का रिटर्न पूरी तरह बाजार के अधीन होता है। जहां जोखिम की पूरी संभावना है। ऐसे में सरकारी कर्मचारियों को इस पर ज्यादा भरोसा नहीं है। अगर एनपीएस लम्बे समय तक चलाया जाए तभी पेंशन के रूप में ठीक-ठाक राशि मिलती है। क्योंकि इस पर कर्मचारी के सेवाकाल का भी सीधा असर पड़ता है।
एनपीएस लेने वाले कर्मचारी सेवानिवृत होने पर कुल रकम का 60 फीसदी एकमुश्त निकाल सकते हैं। जबकि 40 फीसदी से बीमा कंपनी का एन्युटी प्लान खरीदना होगा। इसी राशि पर मिलने वाला ब्याज हर महीने पेंशन के रुप में दिया जाता है। साफ है कि एन्युटी की राशि और उसका ब्याज जितना ज्यादा होगा, पेंशन भी उतनी अधिक मिलेगी।
