घंटाघर पर लगे विज्ञापन पर इतना हो-हल्ला क्यों??

घंटाघर पर लगे विज्ञापन पर इतना हो-हल्ला क्यों??

सौरभ सिंह गुंसाई

राजधानी देहरादून स्थित घण्टाघर पर घर से थैला लाने के आह्वान पर कोई विज्ञापन लगे होने पर हल्ला चल रहा है। पर मुझे लगता है जो सम्भव प्रयास हों पॉलीथीन को रोकने के लिए, वे करने चाहिए। हालांकि ह्यूमन चैन बनाने से ले कर कुछ दिन चालान काटने की औपचारिकतायें हों या फिर यह घण्टाघर को ढकने का यह तरीका हो, किसी भी प्रयास से पॉलीथीन का प्रयोग कम होने का नाम नहीं ले रहा। इस घंटाघर को कुछ दिन पूरा ढक देने से भी लोगों में पॉलीथीन के प्रति जागरूकता आएगी तो वह भी कर देने से कोई गुरेज नहीं होना चाहिए।

टिहरी का घण्टाघर जिसका इतिहास इतना समृद्ध और पुराना है, हमने वह राष्ट्र के नाम दे दिया है और वहां के विस्थापित दुबारा विस्थापन के मुहाने पर खड़े हैं। ये वाला तो आंशिक तौर पर ही ढका गया है। चलिए विज्ञापन के नाम पर ही सही आप कुछ नोटिस तो कर रहे हैं वरना तो आपको कोई फर्क पड़ता भी नहीं। ऐसे भी बिरले देखता हूँ बाजारों में जो दुकानदार से दो पॉलिथीन चढ़ा कर सामान देने की जिद करते रहते हैं।

बताओ न जो लोग इस विज्ञापन का बहिष्कार कर रहे हैं वे थैला ले कर साथ चलते हैं? नहीँ चलते।
चलिए बुर्ज खलीफा की बात करते हैं। दुनिया की सबसे ऊंची इमारत पर हमने कई मौकों पर भारत का झंडा लगा देखा। दुबई वाले वाले बुरा मान जाते तो क्या बार बार हमें बुर्ज खलीफा पर हमारा झंडा दिखाई देता?

खैर जिनकी मर्जी और सोच से यह विज्ञापन इस घण्टाघर पर लगा है और आये दिन ह्यूमन चैन बना कर हो या विभिन्न माध्यमों से पॉलीथीन बन्द कराने की मुहिम छेड़ते रहते हों वे यह करते रहेंगे। सीखना आवाम को है। कुछ हम बदलें तो कुछ व्यवस्था बदले इसी से बेहतर कल सुनिश्चित होगा।

(सौरभ सिंह गुंसाई उदीयमान पत्रकार है, आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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