– अधिकांश बाबाओं की पोल खुली, फिर क्यों बेवजह विश्वास कर रहे
– सोचो, जब देश में इतने बाबा और भक्त हैं तो पाप, अनाचार, व्याभिचार और दुख क्यों है?
2019 की बात है। केदारनाथ में हलकी बर्फ गिर रही थी। मैं भीग गया था और ठंड से कांप रहा था। मेरे साथ मोहित डिमरी भी था। केदारनाथ में मुरारी बापू की कथा चल रही थी। कथा समाप्त होने के बाद मैं उनका इंटरव्यू लेने वीआईपी हेलीपैड के निकट बने उनके निवास स्थान पर गया। अलाव के साथ बापू पालती मार कर बैठे थे। उनके मुख पर तेज था। मैंने हौले से पहला ही सवाल किया, बापू आपके शब्दों में पाप और पुण्य की परिभाषा क्या है? मुरारी बापू ने कुछ देर मुझे घूरा और फिर कहा, दूसरों को कष्ट देना पाप है और परोपकार करना पुण्य है। मैं संतुष्ट हो गया। इंटरव्यू लंबा था। सब यहां नहीं कह सकता। बाद में मुझे पता चला कि वेदव्यास ने 18 पुराणों में यह बात कही है। ‘अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडन्‘।
खैर, मुद्दे की बात पर आता हूं। भक्ति से पाप तर जाते हैं और पुुण्य मिलता है। यानी खुशी मिलती है। गुरु ज्ञान देता है। यदि गुरु अच्छा है तो जीवन सार्थक है और यदि गुरु गुरुघंटाल है तो कहना ही क्या? 2008 की बात है। मेरी बड़ी चाची आशाराम की बहुत बड़ी भक्त थी। दिन में कई-कई घंटे उनकी तस्वीर के आगे पूजा करती। मैं अक्सर उनकी इस भक्ति पर हंसता था तो बहुत चिढ़ती थी। उस दौरान मैं नवभारत टाइम्स में कार्यरत था। एक बार फरीदाबाद में आशाराम आये और कथा की। मैंने उनके चेलों से इंटरव्यू के लिए कहा और एक दिन उनके चेलों ने मुझे आशाराम की गाड़ी में उनके साथ बिठा दिया।
उनकी कार खड़ी ही थी। कार में एक बाल्टी भर कर टॉफी रखी थी। कुछ रसगुल्ले के डिब्बे भी थे। आशाराम के चेले कार घेर रहे थे। मैं उनका इंटरव्यू कर रहा था। आशाराम बीच-बीच में बाल्टी में से मुट्ठी भर टॉफी निकालते और बाहर भीड़ पर फेंक देते, साथ ही चिल्लाते, ‘लो कुत्तो‘। मुझेे बहुत बुरा लग रहा था। मैंने उनसे अध्यात्म के साथ ही उनके अहमदाबाद आश्रम में रहस्यमय तरीकें से दो बच्चों के मरने संबंधी सवाल भी पूछा तो उनकी भाव-भंगिमाएं बदल गयी। मेरे सवालों के जवाब में अनमने हो गये। मैं समझ गया और उनकी कार से उतर गया। उन्होंने मुझे ढेर सारी टाफियां दीं।
जब चाची को पता लगा कि मैं आशाराम के साथ कार में बैठा तो बोली, लो भक्ति मैं कर रही हूं और प्रसाद तुझे मिल गया। कुछ समय बाद आशाराम की पोल खुल गयी। चाची ने अब गुरु बदल लिया है और ब्रह्मकुमार-ब्रह्मकुमारी हो गयी हैं। छोटी चाची मेरी मैगजीन उत्तरजन टुडे बेचने की बजाए एक ऐसे गुरु की किताबें घर-घर बेचती है जो कई साल से लेप के सहारे कहीं बंद हैं। आशुतोष महाराज के भक्तों को आज भी विश्वास है कि उनके गुरु समाधि में हैं और एक दिन जिंदा हो जाएंगे। मैं किसी गुरु और किसी भक्त की आस्था पर सवाल नहीं उठा रहा। भक्ति करो, गुरु भी बनाओ, लेकिन दिल और दिमाग खोलकर।
मैं नास्तिक नहीं हूं। मेरे भी गुरु हैं लेकिन अलग-अलग। मैं न्यूज रूम में अपने से कहीं जूनियर पत्रकार साथी से भी सीखता हूं। सीखा भी हूं। प्रिंट से इलेक्ट्रानिक मीडिया में आया तो नये बच्चों ने मुझे बुनियादी चीजें भी सिखाईं। गुरु कोई भी सकता है, अच्छी सीख कोई भी दे तो ले लें, लेकिन पोंगा पंडित और ढ़ोंगी बाबाओं की अंधभक्ति से चिढ़ होती है। धर्मगुरु का अपने धर्म को प्रचारित करने और उसे अच्छा बताना ठीक है लेकिन दूसरे धर्म की निंदा करना और भड़काना निंदनीय है। धर्म और जाति सबसे संवेदनशील विषय हैं। इन मुद्दों पर कोई भी भड़क सकता है।
सोचिए जब देश में इतने धर्म गुरू और बाबा हैं। उनके लाखों करोड़ो भक्त हैं। फिर भी देश में भ्रष्टाचार, व्याभिचार, शोषण, हिंसा और बिना मतलब एक दूसरे के खिलाफ ईर्ष्या और शत्रुता क्यों हैं? क्यों हम सुखी नहीं हैं? ऐसे में अच्छे गुरु का चयन करना भी चुनौती है। सोच-समझकर गुरु चुनें। उत्तराखंड में पहले ही हरिद्वार और ऋषिकेश में ढोंगी बाबाओं की पौ-बारह है। सुना है अब एक और बाबा आ रहा है। अंधभक्ति से बचें, अच्छे कर्म करें, पाप करने से बचे तो बिना बाबाओं की शरण में जाए भी पुण्य स्वाभाविक रूप से मिल जाएगा।

