देहरादून। केदारनाथ के पूर्व विधायक और कांग्रेस नेता मनोज रावत ने भाजपा की प्रदेश सरकार पर अपनी चहेती कम्पनियों को कोड़ियों के भाव जमीन देने का आरोप लगाया है। शनिवार को राजीव भवन में उन्होंने पत्रकार वार्ता में तमाम तरह दस्तावेज प्रस्तुत कर प्रदेश सरकार की कथनी और करनी पर सवाल खड़े किये।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में भू-कानून से संबधित बहुत बड़े आंदोलन हो रहे हैं। हजारों के संख्या मेें लोग इन आंदोलनों में सम्मिलित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर से धामी ने अभी हाल ही में केदारनाथ विधानसभा के अगस्त्यमुनि में घोषणा की कि, जल्दी ही कठोर भू-कानून लाया जायेगा। उन्होंने कहा कि ऐसी घोषणा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह 2022 में भी करके एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति बना कर कर चुके थे।
उन्होंने कहा कि कठोर भू-कानून छोड़िये 2018 के बाद भाजपा सरकारों ने जो परिवर्तन उत्तराखण्ड (उत्तर प्रदेश जंमीदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950) की कुछ धराओं जैसे 143 और 154 मंे कर दिए हैं उनसे उत्तराखण्ड की सारी कीमती जमीनें बिक चुकी हैं।
उन्होंने मंसूरी के जार्ज एवरेस्ट के दस्तावेज प्रस्तुत कर बताया कि कैसे उत्तराखण्ड सरकार राज्य की खरबों की जमीनों को कौड़ियों के भाव अपनी चहेती कंपनियों या समूहों को दे रही है।
उन्होंने कहा कि एक तरफ धामी सरकार राज्य के बाहरी बड़े लोगों को हजारों बीघा जमीन देकर नए जमींदार पैदा कर रही थी दूसरी तरफ आज भी हर तहसील में धारा 143 में कृृषि भूमि को अकृृषित करके होटल, लोन लेकर घर बनाने के सैकड़ों मामले पेड़िग हैं। बताया कि तहसील केदारनाथ की ऊखीमठ में ही सैकड़ों लोग अपनी जमीन को 143 करने के लिए सालों से एड़ियां रगड़ रहे हैं। याने एक तरफ बाहरी बडे़ लोगों को उपहार में हजारों बीघा जमीनें दी जा रही हैं और राज्य के स्थानीय लोग अपनी 1 नाली जमीन को व्यवसायिक घोषित करने के लिए सालों तक तहसील के चक्कर लगा रहे हैं।
उन्होंने प्रदेश की भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि 2017 में प्रदेश में आई भाजपा की सरकार ने धनपतियों की यह आशा पूरी कर दी। 6 दिसंबर 2018 उत्तराखण्ड के इतिहास में काले दिन के रुप में जाना जायेगा। इस दिन उत्तराखण्ड विधानसभा में, भाजपा की त्रिवंेद्र रावत सरकार ने उत्तर प्रदेश जंमीदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 में भारी बदलाव कर दिए गए। इन बदलावों के बाद कोई भी धन्ना सेठ पैसे लेकर आकर श्रीनगर और गौचर, अगस्त्यमुनि, श्रीनगर द्वाराहाट, गैरसैण तो छोड़िए भारत -तिब्बत सीमा के मलारी, मिलम, मुनस्यारी, धरचूला जैसे आन्तरिक सीमा के क्षेत्र में भी कितनी ही भूमि, औद्योगिक प्रयोजन के नाम पर खरीद कर देश की सुरक्षा को भी खतरा पैदा कर देगा।
दिसंबर 2018 के उत्तर प्रदेश जंमीदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950 की धारा 143 और 154 में बदलाव के बाद अब उत्तराखण्ड देश का इकलौता पहाड़ी राज्य हो गया है जहां कोई भी कितनी भी मात्रा में कृृषि भूमि खरीद सकता है। ये पर्वतीय जिलों के साथ तो छलावा है ही देश की सुरक्षा के लिए भी चुनौती है। देश के पहाड़ी राज्यों ही नहीं महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के भू-कानून भी कृृषि भूमि की खरीद-फरोख्त को रोकते हैं।
पूर्व विधायक मनोज रावत ने कहा कि 2017 में आयी भाजपा की सरकारें यहीं पर नहीं रुकी। दिसंबर 2018 में किए इन परिवर्तनों के बाद जब भी सरकार को लगा कि, अभी भी कानून के कुछ प्रावधान कृृषि भूमि की खरीद-फरोख्त को रोक रहे हैं या बाधित कर रहे हैं तो उसने उत्तराखण्ड (उत्तर प्रदेश जंमीदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950) में परिवर्तन करने में कोई हिचक नहीं की। 2018 से लेकर आज तक इस कानून में 11 संशोधन किए गए।
उन्होंने कहा कि 2022 में पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने त्रिवेन्द्र सरकार द्वारा जोड़े गए इस प्रावधान ‘‘ 143 क’’ को हटा दिया गया। ‘‘143 क’’ को हटाने के बाद राज्य में कोई भी व्यक्ति, अफगानिस्तान या पाकिस्तान सहित किसी भी देश के व्यक्ति की कोई भी कंपनी कितनी भी मात्रा में जमीन औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीद सकती है। और उसका प्रयोग औद्योगिक प्रयोजन के लिए न करने पर भी सरकार उसका कुछ नही ंकर सकती है। याने औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदी गई कृृषि भूमि का प्रयोग प्लाटिंग आदि के लिए कर सकती है। राज्य में ऐसे सैकड़ो उदाहरण हैं।
