5 माह से वेतन बंद, अधिनियम के उल्लंघन के आरोप—उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज
देहरादून/नई दिल्ली:
मसूरी स्थित एमपीजी कॉलेज (म्युनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज) में प्रबंधन समिति के गठन को लेकर उठे विवाद ने अब व्यापक स्तर पर चर्चा छेड़ दी है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा 6 फरवरी को आयोजित वर्चुअल बैठक में कॉलेज प्रशासन की अनुपस्थिति ने पूरे मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।
सूत्रों के अनुसार, बैठक में कॉलेज की ओर से न तो प्राचार्य और न ही कोई अधिकृत प्रतिनिधि शामिल हुआ। इससे यह सवाल उठ रहा है कि प्रशासन अपनी स्थिति स्पष्ट करने से क्यों बच रहा है।
🔎 कानून बनाम प्रबंधन
उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 (उत्तराखंड में यथालागू) की धारा 2(13) के अनुसार यदि कोई महाविद्यालय नगर पालिका द्वारा संचालित/अनुरक्षित है, तो वहां “शिक्षा समिति” का गठन अनिवार्य है। इसके बावजूद कॉलेज में “प्रबंधन समिति” के गठन की प्रक्रिया पर आपत्तियां दर्ज की गई हैं।
⚠️ प्रमुख आरोप
▪ संचालन संस्था पर अस्पष्टता:
कॉलेज का वास्तविक संचालन किसके अधीन है—नगर पालिका, सोसायटी या ट्रस्ट? प्रशासन स्पष्ट दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाया है।
▪ सुरक्षा निधि में छूट का आधार:
धारा 13.06 के तहत सुरक्षा निधि में छूट किस आधार पर दी गई? यदि नगर पालिका द्वारा अनुरक्षित होने का दावा है, तो शिक्षा समिति का गठन क्यों नहीं?
▪ बायलॉज की मूल प्रति अनुपलब्ध:
उपविधियों (Bylaws) की मूल प्रति प्रस्तुत न कर पाने से प्रबंधन की वैधानिक स्थिति पर प्रश्न उठ रहे हैं।
▪ 5 माह से वेतन बंद:
अक्टूबर 2025 से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलने की जानकारी सामने आई है। इसे प्रशासनिक विफलता और मानवीय संकट बताया जा रहा है।
▪ राज्य प्रतिनिधि की अनुपस्थिति:
कर्मचारियों का वेतन राज्य सरकार द्वारा दिए जाने के बावजूद बैठक में राज्य प्रतिनिधि की अनुपस्थिति पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रही है।
🎓 छात्र हित भी प्रभावित
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विवाद जल्द सुलझाया नहीं गया, तो इसका असर छात्रों की पढ़ाई और परीक्षाओं पर पड़ सकता है। मामला उच्च न्यायालय या केंद्रीय स्तर तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
📢 प्रमुख मांगें
कॉलेज के संचालन की वैधानिक स्थिति सार्वजनिक की जाए
अधिनियम के अनुरूप “शिक्षा समिति” का गठन सुनिश्चित किया जाए
कर्मचारियों का लंबित वेतन तत्काल जारी किया जाए
निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या संबंधित संस्थाएं पारदर्शिता बहाल कर विवाद सुलझाएंगी या मामला और तूल पकड़ेगा ?

