पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र को एक बार फिर मिल सकती है सूबे की कमान

पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र को एक बार फिर मिल सकती है सूबे की कमान

देहरादून। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे की पेशकश के बाद एक बार फिर सियासी गलियारों में पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नाम की चर्चायें शुरू हो गई हैं। नये सीएम के नाम की दौड़ में त्रिवेन्द्र सिंह रावत का नाम सबसे से आगे चल रहा है।

त्रिवेन्द्र सिंह रावत प्रदेश भाजपा के बड़े नेता हैं। उन्हें सरकार से लेकर संगठन का बड़ा अनुभव है। उन्होंने चार साल प्रदेश की सफलतापूर्वक बागडोर संभाली। उनके कार्यकाल में प्रदेश में विकास के ऐतिहासिक कार्य हुए हैं। गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी की बनाए जाने से लेकर आयुष्मान कार्ड के जरिये 5 लाख तक का मुफ्त इजाल जैसे जनपयोगी फैसले पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र ने कार्यकाल अपने कार्यकाल में लिये।

उनका कार्यकाल कई ऐतिहासिक फैसलों के लिए जाना जाता है। गैरसैण प्रदेश में एक राजनैतिक मुद्दा बन कर रह गया था लेकिन त्रिवेन्द्र साहसिक फैसला लेते हुए उत्तराखण्ड की जनता के भावनाओं के मुताबिक गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा दिलाया।

भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति रखने वाले त्रिवेन्द्र के मुख्यमंत्रित्व काल में भ्रष्टाचारियों के हाहाकार मचा हुआ था। कई ऐसे मामले हैं जिनमें त्रिवेन्द्र ने किसी दबाव में ना आकर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की। प्रदेश में ये पहली दफा हुआ कि के प्रदेश के भ्रष्टाचारी अफसरों के खिलाफ भी त्रिवेन्द्र सरकार में कार्रवाई हुई।

त्रिवेन्द्र रावत ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिन्होंने समाज के हर तबके का ख्याल रखा। गांव-गांव को सड़कों से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत उनके कार्यकाल में रेकार्ड कार्य हुआ। उन्होंने हर घर को पेयजल मुहैया कराने के लिए एक रुपये में पानी का कनेक्शन की योजना बनाई जिससे समाज के गरीब तबके तक पेयजल मुहैया कराया जा सका।

वे पहाड़ी काश्तकार महिलाओं के लिए घसियारी योजना लेकर आए जिसमें उन्होंने पशुओं के चारा सुलभ कराने की योजना बनाई है। उन्होंने महिलाओं को उनकी पैतृक सम्पत्ति में हिस्सेदार का अधिकार दिलाने का काम किया। महिलाओं को उनकी पैतृक सम्पति में हिस्सेदारी दिलाने वाला उत्तराखण्ड पहला राज्य बना।

कोरोना काल के दौरान गांव वापस लौटे नौजवानों को रोजगार मुहैया कराने के लिए उन्होंने सीएम स्वरोजगार योजना चलाई। कोरोना की पहली लहर के दौरान उनका मजबूत प्रबंधन कौशल दिखाई दिया जिससे जानमाल का नुकसान हुआ।

उनका आपदा प्रबंधन का कौशल रैणी आपदा के समय दिखाई दिया जहां त्वरित राहत और बचाव के कार्य के चलते बड़े जानमाल का नुकसान होने से बचाया। पूर्व सीएम ने उस दौरान ग्राउण्ड जीरो से स्थिति का पूरा जायजा लिया।

कहते हैं कि राजनीति में कब क्या हो जाय किसी को भी पता नहीं होता। कुछ ऐसा ही हुआ और त्रिवेन्द्र रावत बजट सत्र के दौरान अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया। उस दौरान पार्टी के पर्यवेक्षक डा० रमन सिंह और प्रदेश प्रभारी दुष्यंत गौतम भी इस्तीफे के कारणों को स्पष्ट नहीं कर सके। लेकिन भाजपा के इन नेताओं ने उस वक्त ये ही बयान दिया था कि त्रिवेन्द्र रावत के कार्यकाल में विकास के ऐतिहासिक काम हुए हैं। और त्रिवेन्द्र रावत के काम-काज के आधार पर ही पार्टी चुनाव मैदान में उतरेगी।

इधर राजनीति के जानकार सीएम तीरथ के इस्तीफे के बाद बताते हैं कि त्रिवेन्द्र रावत एक बार फिर सीएम बन सकता है। जानकारों का तर्क है मेजर जनरल खण्डूडी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। खण्डूडी के इस्तीफे के बाद तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को प्रदेश की बागडोर सौंपी गई लेकिन ऐन चुनाव से पहले जनरल खण्डूडी पर ही उस वक्त पार्टी हाईकमान ने भरोसा दिखा था। जानकार बताते हैं कि भाजपा हाईकमान एक बार फिर इसी तरह का कोई फैसला ले सकती है।

देहरादून से राजनीति को कवर करने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद त्रिवेन्द्र रावत एक मजबूत नेता उभरकर सामने आये हैं। वे लगातार सक्रिय हैं। पार्टी में उनके विरोधी भी उनके समर्थन में आ चुके हैं। वे इस वक्त प्रदेश भाजपा के ऐसा नेता जिनका आधार पहाड़ और मैदान दोनों जगह मजबूत है।

वे बताते हैं कि पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र की छवि बेदाग है। इस्तीफ देने के बाद उन्होंने पार्टी के खिलाफ कोई अनर्गल बयानबाजी भी नहीं की। और एक अनुशासित सिपाही की तरह जनसेवा में जुटे रहे हैं। आज तक भी उनके इस्तीफे के कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है।

राजनीति के जानकार बताते हैं कि भाजपा के पास चुनाव मैदान में उतरने के लिए एकमात्र त्रिवेन्द्र के चार साल के कामकाज का आधार है। फिलहाल नया सीएम कौन बनेगा ये विधायक दल की बैठक के बाद ही तय होगा।

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