देहरादून। भू-कानून की मांग की मुहिम के समर्थन में केदारनाथ विधायक मनोज रावत आ गये हैं। पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया में भू-कानून की मांग को लेकर बड़ी मुहिम चल रही है। ताकतवर भू-कानून की इस मुहिम को बुद्धिजीवियों, समाज सेवा, कला क्षेत्र से जुड़े बड़ी हस्तियों ने अपना समर्थन दिया है। उत्तराखण्ड की बड़ी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखण्ड क्रांति दल और उत्तराखण्ड से विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी आम आदमी पार्टी पहले से भू-कानून की मांग की इस बड़ी मुहिम को अपना समर्थन दे रहे हैं।
अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिये केदारनाथ विधायक मनोज रावत ने कहा कि यह मुहिम बहुत पहले शुरू हो जानी चाहिए थी। उन्होंने लिखा कि 6 दिसंबर 2018 को जिस दिन प्रदेश की भाजपा सरकार ने उत्तराखंड की विधानसभा में उत्तराखंड(उत्तर प्रदेश)जमींदारी विनाश एवम भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 (र्।त्स्) में धारा 143(क) और 154 में धारा-2 का प्रतिस्थापन किया गया था उसके अगले दिन उत्तराखंड के पहाड़ी जिलो के लोगों को सड़कों पर उतर जाना चाहिए था।
क्यों मांग रहे है भू कानून
जब उत्तराखंड राज्य बना था, उसके बाद साल 2002 तक अन्य राज्यों के लोग उत्तराखंड में सिर्फ 500 वर्ग मीटर तक जमीन खरीद सकते थे। 2007 में यह सीमा 250 वर्गमीटर की गई। इसके बाद 6 अक्टूबर 2018 में सरकार द्वारा नया अध्यादेश लाया गया। इसके मुताबिक “उत्तरप्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम,1950 में संसोधन का विधेयक पारित किया गया और इसमें धारा 143 (क) धारा 154(2) जोड़ी गई। यानी पहाड़ो में भूमिखरीद की अधिकतम सीमा ही समाप्त कर दी।
एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 के आकडों पर नजर डालें तो उत्तराखण्ड की कुल 8,31,227 हेक्टेयर कृषि भूमि 8,55,980 परिवारों के नाम दर्ज थी। इनमें 5 एकड़ से 10 एकड़, 10 एकड़ से 25 एकड़ और 25 एकड़ से ऊपर की तीनों श्रेणियों की जोतों की संख्या 1,08,863 थी। इन 1,08,863 परिवारों के नाम 4,02,22 हेक्टेयर कृषि भूमि दर्ज थी, यानी राज्य की कुल कृषि भूमि का लगभग आधा भाग। बाकी 5 एकड़ से कम जोत वाले 7,47,117 परिवारों के नाम मात्र 4,28,803 हेक्टेयर भूमि दर्ज थी। उपरोक्त आँकड़े दर्शाते हैं कि, किस तरह राज्य के लगभग 12 फीसदी किसान परिवारों के कब्जे में राज्य की आधी कृषि भूमि है और बची 88 फीसदी कृषक आबादी भूमिहीन की श्रेणी में पहुँच चुकी है।
क्या है हिमांचल का भू-कानून
1972 में हिमाचल में एक सख्त कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत बाहर के लोग हिमाचल में जमीन नहीं खरीद सकते थे। दरअसल हिमाचल इस वक्त इतना सम्पन्न नहीं था। डर था कि कहीं हिमाचल के लोग बाहरी लोगो को अपनी जमीन न बेच दें। जाहिर सी बात थी कि वो भूमिहीन हो जाते। भूमिहीन होने का अर्थ है कि अपनी संस्कृति और सभ्यता को भी खोने का खतरा। दरअसल हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री डा० यशवंत सिंह परमार ये कानून लेकर आ गए थे। लैंड रिफॉर्म एक्ट 1972 में प्रावधान के तहत एक्ट के 11वे अध्याय में बवदजतवस वद जतंदेमित वि संदके में धारा -118 के तहत हिमाचल में कृषि भूमि नही खरीदी जा सकती।
गैर हिमाचली नागरिक को यहां जमीन खरीदने की इजाजत नही। कमर्शियल प्रयोग के लिए आप जमीन किराए पे ले सकते हैं। 2007 में धूमल सरकार ने धारा -118 में संशोधन किया और कहा कि बाहरी राज्य का व्यक्ति, जो हिमाचल में 15 साल से रह रहा है, वो यहां जमीन ले सकता है। इसका बड़ा हुआ और बाद में अगली सरकार ने इसे बढ़ा कर 30 साल कर दिया।
