सियासतः उत्तराखण्ड में राजनैतिक अस्थिरता का शर्तिया इलाज होगा विधान परिषद!

सियासतः उत्तराखण्ड में राजनैतिक अस्थिरता का शर्तिया इलाज होगा विधान परिषद!

रिपब्लिक डेस्क। उत्तराखण्ड को राज्य बने 21 साल हो चले हैं। हाल ही प्रदेश ने अपनी 22वीं वर्षगांठ मनाई। राज्य गठन के बाद से अभी तक राज्य में चार बार विधान सभा चुनाव हो चुके हैं। इस दौरान प्रदेश को रिकार्ड 11 मुख्यमंत्री मिल चुके हैं। भाजपा हो या कांग्रेस कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया और पार्टी के अंदरूनी घमासान के चलते मुख्यमंत्रियों को बीच में ही इस्तीफा देना पड़ा। कांग्रेस की ओर से प्रदेश को अब तक तीन मुख्यमंत्री मिले तो भाजपा सात सीएम दे चुका है। अलबत्ता पूर्व सीएम विजय बहुगुणा अब भाजपा खेमे में है।

प्रदेश में एक बार फिर अगले साल की शुरूआत में चुनाव होने वाले हैं। जिसको लेकर सभी राजनैतिक दल तैयारियों में जुटे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के अलावा भी तमाम मुद्दे उछाले जा रहे हैं। राजनीतिक अस्थितरता भी एक बड़ा मुद्ा बना हुआ है। प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टी यूकेडी और उत्तराखण्ड में अपनी सियासी जमीन तलाश कर रही आम आदमी पार्टी राजनैतिक अस्थिरता को मुद्दा बनाया है। और इसको लेकर भाजपा कांग्रेस दोनों को कठघरे में खड़ा कर रही हैं।
कांग्रेस नेता हरीश रावत ने राजनीतिक अस्थिरता का तोड़ निकाल दिया है। हाल ही में उन्होंने राज्य में विधान परिषद् की गठन किये जाने का बयान देकर खुद को सुर्खियों में ला दिया है। हालांकि बुधवार को उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं को और अधिकार दिये जाने की भी वकालत की है। और इससे राजनीतिक अस्थिरता का एक प्रकार से इस इलाज बताया है।

राजनीतिक अस्थिरता के मुद्दे को दी हवा

हरीश रावत ने फेसबुक के जरिये लिखा है कि ‘एक बिंदु विचारार्थ बार-बार मेरे मन में आता है कि उत्तराखंड में रुराजनैतिक स्थिरता कैसे रहे! राजनैतिक दलों में आंतरिक संतुलन और स्थिरता कैसे पैदा हो! जब स्थिरता नहीं होती है तो विकास नहीं होता है, केवल बातें होती हैं।

मैं पिछले 21 साल के इतिहास को यदि देखता हूँ तो मुझे लगता है कि उत्तराखंड के अंदर राजनैतिक अस्थिरता पहले दिन से ही हावी है। उत्तराखंड में प्रत्येक राजनैतिक दल में इतने लोग हैं कि सबको समन्वित कर चलना उनके लिये कठिन है और कांग्रेस व भाजपा जैसे पार्टियों के लिए तो यह कठिनतर होता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि ‘केंद्र सरकार का यह निर्णय कि राज्य में गठित होने वाले मंत्रिमंडल की संख्या कितनी हो, उससे छोटे राज्यों के सामने और ज्यादा दिक्कत पैदा होनी है। अब उत्तराखंड जैसे राज्यों में मंत्री 12 बनाए जा सकते है, मगर विभाग तो सारे हैं जो बड़े राज्यों में है, सचिव भी उतने ही हैं जितने सब राज्यों में हैं।

मगर एक-एक मंत्री, कई-2 विभागों को संभालते हैं, किसी में उनकी रूचि कम हो जाती है तो किसी में ज्यादा हो जाती है और छोटे विभागों पर मंत्रियों का फोकस नहीं रहता है और उससे जो छोटे विभाग हैं उनकी ग्रोथ पर विपरीत असर पड़ रहा है, जबकि प्रशासन का छोटे से छोटा विभाग भी जनकल्याण के लिए बहुत उपयोगी होता है तो मैंने कई दृष्टिकोण से सोचा और मैंने पाया कि उत्तराखंड जैसे राज्य के अंदर हमें कोई न कोई रास्ता ऐसा निकलना पड़ेगा, जिस रास्ते से राजनैतिक दल चाहे वो सत्तारूढ़ हो या विपक्ष हो उसमें राजनैतिक स्थिरता रहे और एक परिपक्व राजनैतिक धारा राज्य के अंदर विकसित हो सके और एक निश्चित सोच के आधार पर वो राजनैतिक दल आगे प्रशासनिक व्यवस्था और विकास का संचालन करें। यहां मेरे मन में एक ख्याल और आता है, क्योंकि तत्कालिक संघर्ष से निकले हुये लोगों के साथ बातचीत कर मैंने कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में 2002 में विधान परिषद का गठन का वादा किया था, तो कालांतर में कतिपय कारणों के कारण गठित नहीं हो पाई और उसके बाद के जो अनुभव रहे हैं, वो अनुभव कई दृष्टिकोणों से राज्य के हित में नहीं रहे हैं।

इसलिये मैं समझता हूँ कि फिर से इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता पड़ रही है कि विधान परिषद होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए! और मैं समझता हूंँ 21 सदस्यीय विधान परिषद उपयोगिता के दृष्टिकोण से उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए बहुत लाभदायी हो सकती है, राजनैतिक स्थिरता पैदा करने वाला कारक बन सकती है। इससे राज्य में नेतृत्व विकास भी होगा, इस समय, समय की परख के साथ और उत्तर प्रदेश के समय से जिन लोगों ने थोड़ा सा अपना व्यक्तित्व बना लिया था वो तो आज भी राज्य के नेतृत्व की लाइन में सक्षम दिखाई देते हैं। लेकिन जो लोग उत्तर प्रदेश के समय से जिन्हें विशुद्ध रूप से हम यह कहे कि ववो उत्तराखंड बनने के बाद राजनीति में प्रभावी हुए हैं तो ऐसे व्यक्तित्व कांग्रेस और भाजपा में कम दिखाई देंगे।

पंचायती राज संस्थाओं को अधिकार देने की वकालत

पूर्व सीएम हरीश रावत ने एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता पर लगाम कसने के लिए बुधवार को अपने सुझाव दिया है उन्होंने लिखा है कि रुविधान-परिषद के गठन को लेकर एक सुझाव आगे बढ़ाया, वो विशुद्ध रूप से इस समय मेरा निजी विचार है, एक दूसरा मेरा निजी विचार भी है। राजनैतिक स्थिरता के लिए आवश्यक है कि जिला पंचायतों, ब्लॉक प्रमुखों को और अधिकार दिये जाएं और माइक्रो डेवलपमेंट से सम्बंधित कार्यों को पूरी तरीके से पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में दे दिया जाय। जैसे छोटे ताल-तलैया आदि की निर्माण से लेकर उनकी सफाई का काम, ग्रामीण क्षेत्रों में नालियों का निर्माण, ग्रामीण क्षेत्रों में पानी निकासी बड़ी समस्या है और उससे कई वाटर जन्य बीमारियां हो रही हैं, इन कामों के लिये भारी-भरकम विभाग बनाने की आवश्यकता नहीं है, पंचायत इस दायित्व को निभा सकती है। इसी प्रकार से बहुत सारे और काम हैं जिनको अख्तियार के रूप में उन विभागों का नियंत्रण पंचायतों को सौंपा जाना चाहिये। जब अधिकारों विकेन्द्रीकरण होता है तो संतुष्टि का तत्व बढ़ता है।

विरोधियों ने किया हरदा के बयान पर कटाक्ष

जाने-माने आंदोलनकारी और भाकपा माले नेता इन्द्रेश मैखुरी ने हरीश रावत के इस बयान पर कटाक्ष किया है। ‘नुक्ता-ऐ-नजर’ में उन्होंने लिखा है कि उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए कॉंग्रेस की कैम्पेन कमेटी के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नेताओं के लिए भी चुनावी घोषणा का चुग्गा फेंक दिया है. रावत साहब कह रहे हैं कि उत्तराखंड के विकास के लिए विधान परिषद बहुत जरूरी है,वही राज्य में स्थिरता लाएगा! परोक्ष रूप से अपनी बिरादरी यानि सत्ता की मलाई के लिए जीभ लपलपाने वाली बिरादरी को यह संदेश है कि विधान सभा की सत्तर सीटों में नंबर न आए तो घबराना नहीं, तुम्हारे लिए विधान परिषद का बंदोबस्त करवाऊँगा मैं!

यानि अब की बार चुनाव में टिकट की दौड़ से वंचित रहने वालों को भी झुनझुना थमा दिया है,रावत साहब ने ! हालांकि विधान परिषद को भी रावत साहब ने अपनी इच्छा की तरह ही प्रकट किया है. पर रावत साहब की इच्छाएं कैसी होती हैं, ये सब जानते ही हैं. पहले उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वे उत्तराखंड में किसी दलित को मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं. उसके कुछ दिन बाद वे केदारनाथ गए और उन्होंने स्वयं खुलासा किया कि वे स्वयं के मुख्यमंत्री बनने की मन्नत मांग आए हैं!

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