उत्तराखण्डः ‘रैफर सेंटर’ बने जिला अस्पताल, सरकारें जिला अस्पतालों की सेहत सुधारने में रही नाकाम

उत्तराखण्डः ‘रैफर सेंटर’ बने जिला अस्पताल, सरकारें जिला अस्पतालों की सेहत सुधारने में रही नाकाम

रिपब्लिक डेस्क। सीमान्त जिला पिथौरागढ के सबसे बड़े जिला अस्पताल में लम्बे समय से कार्डियोलॉजिस्ट, रेडियो लॉजिस्ट सहित कई अन्य पदों पर चिकित्सक नहीं होने से लोग परेशान है। मौजूदा समय में उत्तराखण्ड में 13 जिले हैं तो इन जिलों की आवाम की सेहत की देखभाल के लिए 13 जिला अस्पताल भी हैं। लेकिन दूसरे 12 जिला अस्पतालों के हालात भी पिथौरागढ़ जिला अस्पताल से जुदा नहीं है।

पिथौरागढ़ के जिला अस्पताल की ही बात करें तो ये अस्पताल महज ‘रैफर सेंटर’ बन कर रहा गया है। पूरे जिले की सेहत का जिम्मा संभाले इस अस्पताल में महज एक ही रेडियोलॉजिस्ट है। जिसके ऊपर महिला अस्पताल का भी जिम्मा है। जानकारी के मुताबिक अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट और हृदय रोग विशेषज्ञ का पद लम्बे समय से खाली हैं। हृदय रोगियों को फिजीशियन ही देख रहे हैं। गंभीर मामलों में मरीजों को हायर सेंटर रैफर कर दिया जाता है।

दरअसल उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं बहाल कराना यहां सत्ता में बैठे लोगों की कभी प्राथमिकता में ही नहीं रहा। ना ही विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को ईमानदारी से उठाया। उत्तराखण्ड को बने 21 साल का अरसा गुजर चुका है। इस 21 साल के अरसे में बारी-बारी कांग्रेस और भाजपा सत्ता का सुख भोग चुकी है। क्षेत्रीय दल उक्रांद भी दोनों दलों के साथ सत्ता में हमसफर रही।

उत्तराखण्ड में एक बार फिर पांचवी मर्तबा विधान सभा चुनाव होने जा रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा के साथ आम आदमी पार्टी और उक्रांद भी चुनावी समर की तैयारियों में जुटी है। प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर परिवर्तन यात्रा निकाल रही है। सत्ताधारी दल भाजपा जन आशीर्वाद रैली निकाल कर अपनी सरकार के काम-काज को जनता को बता रही है। आम आदमी पार्टी मुफ्त बिजली-पानी के सहारे उत्तराखण्ड में सत्ता का रास्ता तलाश रही है। उक्रांद के पास भू-कानून और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे हैं। लेकिन शायद ही इन राजनैतिक दलों के एजेण्डे में जिला अस्पतालों की बदहाली हो।

जिला अस्पतालों की बदहाली और दुर्दशा पर नीति आयोग की रिपोर्ट सरकारों को आईना दिखाने के लिए काफी है। बीते सितम्बर महीने में नीति आयोग ने जिला अस्पतालों के कामकाज में अपनाये जा रहे तौर-तरीकों पर रिपोर्ट जारी की। जिसमें नीति आयोग ने माना जिला अस्पतालों में तमाम कमियां है। नीति आयोग के सदस्य ने कहा कि उन्नत माध्यमिक देखभाल प्रदान करने में उनकी (जिला अस्पतालों की) महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, दुर्भाग्य से कुछ कमियां भी हैं, चाहे वह मानव संसाधनों की कमी हो, क्षमता, उपयोग और सेवा में वृद्धि की बात हो। इस रिपोर्ट को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व स्वास्थ्य संगठन की भारतीय इकाई ने आपसी सहयोग से तैयार किया है।

दरअसल जिला अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया करना राजनैतिक दलों के एजेण्डे में कभी रहा ही नहीं। उत्तराखण्ड के इतिहास में जिला अस्पतालों की बदहाली को लेकर कोई बड़ा सामाजिक आंदोलन हुआ हो ऐसा भी देखने को नहीं मिलता।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतरी के प्रयासों की सरकारों के पास तमाम आंकड़े हैं। लेकिन इन सरकारी प्रयासों को धरातल पर असर कहीं दिखाई नहीं देता है। मौजूदा सरकार ने सूबे की आवाम को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराने को पीपीपी मोड का रास्ता अख्तियार किया है। लेकिन इसका धरातल पर कोई असर तो दीखता नजर नहीं आता है। सरकार भले ही इसको अपनी उपलब्धियों में गिनाये लेकिन सच्चाई यही है।

स्वास्थ्य के मामले में यहां की सरकारों ने उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों के साथ हमेशा से सौतेला व्यवहार किया है। राज्य बनने के बाद शायद ही कोई बड़ा अस्पताल पहाड़ी जिलों के हक में आया हो। अभी हाल ही में केन्द्र सरकार ने एम्स का सैटलाइट केन्द्र खोलने को मंजूरी दी, लेकिन ये केन्द्र भी कुमाऊ के मैदानी क्षेत्र किच्छा में खोला जा रहा है। राज्य में एम्स की शाखा है लेकिन राज्य सरकारों ने इसे पहाड़ी क्षेत्र के बजाय गढ़वाल के मैदानी क्षेत्र ऋषिकेश में जगह दी।
राज्य में सत्ता में बैठी सरकारों ने स्वास्थ्य सुविधाओं मुहैया के नाम पर यहां के तमाम अस्पतालों का उच्चीकरण किया। इसको अपनी उपलब्धियों में भी गिनाया। लेकिन वहां डाक्टरों की बहाली और दूसरी तमाम सहूलियतें मुहैया कराना भूल गई।

स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में सरकारों की बेरूखी का ही नतीजा है कि आज भी उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र के लोगों को मामूली सी बीमारी और एक्सरा, अल्ट्रासाउण्ड के लिए देहरादून-हल्द्वानी की दौड़ लगानी पड़ती है। यदि सरकारों ने जमीन स्तर पर काम किया होता तो पहा़ड़ी क्षेत्र के इन लोगों को दून-हल्द्वानी की दौड़ नहीं लगानी पड़ती।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *