4 अगस्त 1906 को यशवंत परमार का जन्म गांव चनालग जनपद सिरमौर हिमांचल में हुआ .. उन्हें हम पर्वतीय राज्यों के विकास शिल्पी के रूप में जानते हैं।
कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक ट्रांस हिमालयन बेल्ट में चाहे राज्य कोई भी हो, लेकिन जब भी उसके विकास की राह रूकती है तो वह राज्य अपने यथोचित विकास के लिए आज भी यशवंत परमार के सुझाए रास्ते की ओर ही देखता है ।
इस बीच जब उत्तराखंड पर्वतीय राज्य के गठन के 20 वर्ष हो चुके हैं. बीते 20 सालों में ,जिन उम्मीदों के साथ उत्तराखंड राज्य गठन का संघर्ष किया गया था। वह उम्मीदें लगभग नाउम्मीदी में तबदील हैं।
लोगों में गहरी हताशा व्याप्त है। दर्जनों प्राइमरी और इंटर के विद्यालय बंद हो चुके हैं। पॉलिटेक्निक और आईटीआई तेजी से बंद किए जा रहे हैं। ग्रामीण पर्वतीय क्षेत्र के अधिकांश अस्पताल डाक्टर विहीन हो रहे हैं।
साल भर में लगभग एक दर्जन बहनो की प्रसूति सडक पर हो चुकी है। पलायन ने हजारों गांवों को भूतहा कर दिया है। इस हताशा के बीच उम्मीद की आश, आज भी यशवंत परमार के माडल में दिखती है।
1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष दिया गया यशवंत परमार का यह वक्तव्य आज भी पर्वतीय राज्यों का आधार वाक्य है।
‘हम पहाड़ के लोगों की अपनी अलग संस्कृति है, अपनी अलग भाषा है, हमारा खान-पान अलग है. पहनावा अलग है, विश्वास और श्रद्धा, रीति-रिवाज और परंपराएं अलग हैं।
हर राष्ट्र जो विकसित हुआ है ,उसने अपने नागरिकों के रहन-सहन की शैली को एक मूल अधिकार ,उत्तरदायित्व और अवसर के रूप में स्वीकार किया है।
यही लोकतांत्रिक संस्कृति है। यही कारण है कि ऐसे सारे सामूहिक प्रयास जो विकास तो लाते हों, पर स्थानीय संस्कृत से मेल नही खाते हों, चाहे वह वनों से संबंधित हो अथवा नमक के अधिकार से अथवा परिवार से उनके विरुद्ध विद्रोह ही पनपा है।
यशवंत परमार द्वारा की गई अलग पर्वतीय राज्य की प्रभावी पैरवी को राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्य जस्टिस फजल अली द्वारा रेखांकित किया गया और तभी हिमांचल और उत्तराखंड के अलग पर्वतीय राज्य के रूप में उनके द्वारा संस्तुति भी की गई थी।
यह अलग बात है कि 1956 में न तो हिमांचल अलग राज्य बन पाया और न पंडित गोविंद बल्लभ पंत के विरोध के कारण उत्तराखड।
पर्वतीय क्षेत्रों की अलग पहचान और इस पहचान के अनुरूप विकास की नीति की अवधारणा ने यशवंत परमार को पर्वतीय राज्यों के विकास पुरुष के रूप में स्थापित किया।
लखनऊ से एम ए, एलएलबी करने के उपरांत वे 11 वर्ष तक सब जज,मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायाधीश रहे लेकिन प्रजामंडल के सुकेत सत्याग्रह में भागीदारी के बाद उन्होंने नौकरी भी छोड़ दी।
हिमांचल की पृष्ठभूमि
15 अप्रैल 1948 को यह 30 स्वतंत्र देसी रियासतों का एक संघ भारत संघ में विलय हुआ जिसे सलाहकार परिषद के माध्यम से चलाया गया। सितंबर 1951 से यह लेफ्टिनेंट गवर्नर और लोकप्रिय मंत्रिमंडल द्वारा शासित राज्य बना, जहां 24 मार्च 1952 को डॉ परमार की अगुवाई में मंत्रिमंडल का गठन हुआ।
दो वर्ष के इस छोटे से कार्यकाल में परमार ने जमीदारी प्रथा के उन्मूलन, निजी जंगलों के उन्मूलन, तथा विकास के मॉडल के लिए ब्लॉक की स्थापना जैसे बुनियादी फैसले लिये।
प्रभावी भूमि सुधार लागू हो, काश्तकार साहूकारों के चंगुल से मुक्त हो इसके लिए उन्होने ब्याज की दर अधिकतम 7.5 प्रतिशत तय कर दी।
जुलाई 1956 में हिमांचल फिर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया, लेकिन अलग राज्य का संघर्ष तब भी जारी रहा।
आखिरकार यशवंत परमार जो कि कांग्रेस के एक महत्वपूर्ण नेता थे, के प्रयासों से 25 जनवरी 1971 को हिमाचल भारत का 18वां राज्य बना ।
परमार ‘विकास के’ पर्याय बने !
हालांकि हिमांचल के अलग पर्वतीय राज्य बनने से पहले कश्मीर तथा उत्तर पूर्व के कुछ राज्य अलग पर्वतीय राज्य का अस्तित्व रखते थे। लेकिन हिमांचल का स्वप्न पूरा होते ही, यशवंत परमार ने पहाड़ी राज्यों के विकास का एक अलग और मौलिक मॉडल खड़ा किया ,जिससे वह पहाड़ में विकास के पर्याय बन गए।
परमार ने कृषि और सड़क को प्राथमिकता देते हुए टैनन्सी एंड लैंड रिफॉर्म्स एक्ट 1972 के जरिए क्रांतिकारी भूमि सुधार लागू किए, हिमाचल के बड़े-बड़े थौकदार जो सिर्फ भूमि के मालिक थे. लेकिन जमीन में काश्तकार कोई और ही थे. जो सिर्फ खेतिहर मजदूर और फटे हाल थे। जमीन से उनका रिश्ता स्थाई और भरोसेमंद बनाने के लिए उन्होंने खेतिहर मजदूर को उस जमीन का मालिक बना दिया। तथा भूमि की अंधाधुंध खरीद-फरोख्त ना हो, इसको नियंत्रित करने के लिए अधिनियम की धारा 118 में हिमांचल प्रदेश से बाहर के व्यक्तियों के लिए हिमांचल में कृषि भूमि क्रय प्रतिबंधित कर दिया।
‘फलो की तश्तरी’ परमार हिमांचल को फलों की तश्तरी के रूप में विकसित करना चाहते थे। इसके लिए जहां वह उत्तर में सेव ,आडू, प्लम को प्राथमिकता दे रहे थे। तो दक्षिण के गर्म और मैदानी जिलों में उन्होंने कीनू, नींबू, मालटा को तरजीह देकर हिमांचल को फलो की तश्तरी के रूप में विकसित किया।
उन्होंने अमेरिका से चार प्रकार के आडू की पौंध आयात की सेव का उन्नत बीज खुद देख कर मंगाया। वह खुद भी बागानों में उतर -उतर कर आकस्मिक निरीक्षण करते थे।
वह बागवानी का कृषि के साथ घालमेल नहीं चाहते थे. इसके लिए उन्होंने 1970 में ही कृषि से उद्यान को अलग विभाग के रूप में विकसित किया ..। खुद के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में बागवानी की देखभाल की ..।
यशवंत परमार की कोशिशें बहुत जल्द रंग लाने लगी, हिमांचल के गांवो में आलू सेव ,आडू और ऊन का अंबार लगने लगा ।
दूरदर्शी परमार 1953 में ही हिमांचल के गांव-गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए एक दस साला प्रोजेक्ट तैयार कर चुके थे। जिसमें हिमांचल के बजट का 30ः सड़क पर खर्च हो रहा था। जिससे उत्पादन के बाद फल बाजार के मोहताज नहीं थे। सरकारी संरक्षण में बाजार गांव तक पहुंच रहा था। हिमांचल का सेव ब्रांड बन चुका था।
शिक्षा है समाधान कमजोर आर्थिकी और कम शिक्षा के कारण हिमांचल का नौजवान पहले देश के महानगरों में होटल ढाबों में देखा जाता था. परमार ने केंद्र शासित प्रदेश के रूप में ही इसे एक चुनौती के रुप में स्वीकार किया।
वह हिमांचल में प्रति व्यक्ति शिक्षा पर ₹235 खर्च करने लगे, जबकि मूल राज्य पंजाब 112 और हरियाणा 118 रुपए खर्च कर रहे थे ।वह अपने बजट का 3.7 प्रतिशत शिक्षा में खर्च कर रहे थे। जो कि उत्तर भारत में सर्वाधिक था. हिमांचल के पढ़े-लिखे नौजवानों ने नए सपने के साथ हिंमांचल विकास में भागीदारी की..।
वन ही है विकास का आधार पर्वतीय राज्य में विकास का मूल आधार सदियों से जंगल उपलब्ध करा रहे हैं।
उनका बेहतर उपयोग कैसे हो इसके लिए यशवंत परमार ने फॉरेस्ट्री का प्रयोग किया, गांव की सरहद पर गांव वालों के लिए उन्हीं के स्वामित्व में चौड़ी पत्ती का वन लगाया… जिसकी देखभाल की जिम्मेदारी उसी गांव के निवासियों और पंचायत की थी ।
यह जंगल जानवरों के लिए चारा, घरों के लिए जलोनी लकड़ी और इमारतों के लिए इमारती लकड़ी सब कुछ उपलब्ध करा रहे थे ।इसके बाद का सरकारी जंगल आरक्षित था, जो पर्यावरण की रक्षा कर रहा था । यहां से देश को सामाजिक वानिकी का विचार यशवंत परमार ने ही दिया . जंगल बचें इसके लिए जरूरी था. गांव- गांव तक बिजली पहुंचे ।
यशवंत परमार ने अपने शासनकाल में ही हिमांचल के दूरदराज के गांवों तक विद्युतीकरण कर दिखाया था।
यशवंत परमार यद्यपि कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे। लेकिन उन्होंने हिमांचल के विकास का जो स्वप्न स्वयं के दम पर देखा ,उसके आडे वह केंद्र को भी नहीं आने देते थे।
1975 के बाद जब राज्य में श्रीमती इंदिरा गांधी का हस्तक्षेप बढ़ रहा था. तब यशवंत परमार उसका विरोध करते थे। इसी विरोध की कड़ी में उन्होंने 24 जनवरी 1977 को उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया, लेकिन हिमाचल के स्वाभिमान और अपने स्वप्न के साथ कोई समझौता नहीं किया।
इस्तीफा देने के बाद के बाद जब वह हिमांचल रोडवेज की बस से अपने गांव बागथान वापस जा रहे थे . उनके पास जमा पूंजी ₹563 तीस पैसे बताई जाती है।
2 मई 1981 को उनका देहावसान हुआ ।
एक स्वप्न दर्शी ,अनुशासित संकल्प के धनी पहाड़ के विकास के शिल्पी राजनयिक के रूप में यशवंत परमार आज भी बेमिसाल हैं।
(प्रमोद शाह की फेसबुक वाल से साभार)
