कुुलपति ने नियम-कायदों को दिखाया ठेंगा, भांजे को ही बना दिया विवि कार्यपरिषद् का सदस्य

कुुलपति ने नियम-कायदों को दिखाया ठेंगा, भांजे को ही बना दिया विवि कार्यपरिषद् का सदस्य

देहरादून। श्रीदेवसुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति नियम विरूद्ध कार्य करते जा रहे हैं। 700 से अधिक छात्र-छात्राओं को अवैध/नियम विरूद्ध प्रवेश और उसके बाद परीक्षा करवाने के मामले में उच्चस्तरीय जांच का सामना कर रहे डॉ. पी.पी. ध्यानी ने अब तक का सबसे बड़ा अवैध कृत्य कर डाला है। कार्यपरिषद के गठन में कुलपति ने नियमों को ताक पर रख कर अपने सगे सम्बन्धियों को ही कार्यपरिषद का सदस्य बना डाला।

 

श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के नियम/परिनियम के अनुसार 04 सदस्य मा. राज्यपाल/कुलाधिपति द्वारा नामित, 01 शिक्षाविद राज्य सरकार द्वारा नामित तथा चक्रानुक्रम में वि.वि. परिसर से वरिष्ठम संकायाध्यक्ष एक आचार्य, सम्बद्ध स्वायत संस्थानों से 01 प्रवक्ता, संबध महाविद्यालयों के 03 वरिष्ठतम प्राचार्य नियुक्त किये जाने का प्रावधान है।नियमों में यह भी व्यवस्था भी दी गई है कि सगे सम्बन्धियों का चयन किया जाना नियम विरूद्ध है, अर्थात सगे सम्बन्धी की चयन नहीं कर सकते। परन्तु कुलपति डॉ.पी.पी. ध्यानी द्वारा अपने आपको नियमों से ऊपर मान लिया है।

नियमों को न मानना उनकी फितरत में है।उन्होंने डी.बी.एस. कॉलेज देहरादून के प्रवक्ता और अपने सगे भांजे (बहन के पुत्र) डॉ. दीपक भट्ट को ही कार्य परिषद का सदस्य नियुक्त कर डाला।जबकि डॉ. दीपक भट्ट डी.बी.एस. कॉलेज में उस विषय के प्रवक्ता हैं जो श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय से सम्बद्ध ही नहीं है।डी.बी.एस. कॉलेज देहरादून, हे.न.ब. गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय से सम्बध है।तथा श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय से मात्र दो पाठ्यक्रम एम.एस.सी. माईक्रोबायोलॉजी तथा एम.एस.सी. बायोटेक की ही मान्यता डी.बी.एस. कॉलेज देहरादून को प्राप्त है।

जिस विषय की विश्वविद्यालय से मान्यता ही नहीं है उस विषय की प्राध्यापक को कार्य परिषद का सदस्य बनाया जाना अत्यंत ही अफसोसजनक व निंदनीय भी है।इसके अतिरिक्त राजकीय महाविद्यालय रायपुर देहरादून के 02 जूनियर प्राध्यापकों को कार्य परिषद का सदस्य बनाया गया है, जबकि विश्वविद्यालय से 56 से अधिक राजकीय महाविद्यालय सम्बद्ध हैं तथा उनमें वरिष्ठतम प्राध्यापक कार्यरत हैं।जूनियर को कार्यपरिषद का सदस्य बनाये जाना तथा सीनियर के साथ अन्याय किये जाने के कारण कईं प्राध्यापकों में कुलपति के विरूद्ध रोष व्याप्त है।

नाम न छापेजाने की शर्त पर 01 प्रवक्ता ने बताया के कुलपति क्षेत्रवाद व जातिवाद के नाम पर कार्य करने के आदी हैं। अधिकतर सम्बधता पेनलों एवं अन्य समितियों में कुछ ही लोगों को वरियता दी जाती है।उन्होंने बताया कि कुलपति डॉ. पी.पी.ध्यानी को न तो परिक्षा कार्यों का अनुभव है और न ही वह लम्बे समय से छात्रों के बीच में रहेहैं। जिस कारण लगातार गलतियों पर गलतियां करते जा रहे हैं।

किसी भी विश्वविद्यालय की कार्य परिषद उसकी सर्वोच्च नियमक संस्था होती है तथा कार्यपरिषद के जिन सदस्यों की नियुक्ति विश्वविद्यालय द्वारा की जाती है उसका अनमोदन शासन अथवा कुलाद्यिपति से लिया जाना अनिवार्य होता है। लेकिन डॉ. पी.पी.ध्यानी द्वारा बिना अनमोदन के ही कार्यपरिषद का गठन करते हुये बैठके भी आयोजित कर दी।जबकि कार्यपरिषद के गठन का शासनादेश शासन द्वारा जारी किया जाता है।

सर्वोच्च नियामक संस्था होने के कारण कार्यपरिषद का अध्यक्ष कुलाधिपति होता है।परन्तु विश्वविद्यालयों की अधिक संख्या को देखते हुये राज्यपाल/कुलाधिपति द्वारा कार्यपरिषद के अध्यक्ष के दायित्व कुलपतियों को सौंपे गये हैं।कुलपति द्वारा नियम विरूद्ध कार्य करना अपराध की श्रेणी में आता है।

कुलपति डॉ.पी.पी.ध्यानी विश्वविद्यालय ने मनमानी तरीके से कार्य करने, विश्वविद्यालयों के धन का दुरूपयोग करने तथा सगे सम्बन्धियों को विभिन्न समितियों में रखकर उन्हें लाभ पहंुचाने तथा विश्वविद्यालयों अधिकारियों व कर्मचारियों के गलत शोषण के आरोप लगते रहे हैं।

दरअसल कुलपति द्वारा किये गये कार्यों का अनुमोदन कार्यपरिषद द्वारा किया जाता है।कार्यपरिषद में सगे सम्बन्धी होने पर एक ओर जहां कोरम पूरा हो जाता है वहीं दूसरी ओर उल्टे सीधे कार्यों को भी अनमोदित करने में आसानी हो जाती है।

उच्चस्तरीय जांच झेल रहे डॉ. पी.पी. ध्यानी के द्वारा गलत तरीके से कार्यपरिषद का गठन करना बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है।पूर्व कुलपति डॉ. यू.एस. रावत द्वारा विश्वविद्यालय स्तर के कार्यपरिषद सदस्यों को नियुक्तकर शासन तथा राजभवन से अनुमोदन प्राप्त कर ही अन्तिम शासनादेश शासन से ही जारी करवाया था।

अतिरिक्त सीटों पर परीक्षा कराने, अपने अधीनस्थ अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार तथा सगे सम्बन्ध्यिों को लाभ पहुंचाने एवं वित्तीय अनियमित्ताओं के बावजूद कुलपति का पद पर बने रहना आश्चर्यजनक ही नहीं अपितु विश्वविद्यालय के लिये दुर्भाग्यपूर्ण भी है।उपरोक्त तथ्यों के आधार पर डॉ. पी.पी.ध्यानी का कुलपति पद पर बने रहना विश्वविद्यालय हित में कतई नहीं है।

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