त्रिलोक चंद्र भट्ट
देहरादून। उत्तराखण्ड में मुख्य सचिव एस एस संधु जाते-जाते भी पत्रकारों को निराश कर गये। वे अपने पूरे कार्यकाल में पत्रकारों को स्व. राप्रसाद बहुगुणा स्मृति राज्यस्तरीय पुरस्कार प्रदान करने के लिए चयन समिति की एक भी बैठक नहीं बुला सके। 1988 बैच के आईएएस अधिकारी, संधू ने जुलाई 2021 में उत्तराखंड के 17वें मुख्य सचिव के रूप में कार्यभार संभाला था। उनके पदभार संभालने के बाद उम्मीद जगी थी कि उत्तराखण्ड में पत्रकारों को तीन श्रेणियों में दिये जाने वाले स्व. राप्रसाद बहुगुणा स्मृति राज्यस्तरीय पुरस्कार की रूकी हुई प्रक्रिया पुनः शुरू होगी। उनके पास सुनहरा अवसर था कि वे वर्ष 2022 और 2023 में हिंदी पत्रकारिता दिवस पर प्रदान किये जाने वाले राज्यस्तरीय पत्रकारिता पुरस्कारों के लिए समिति की बैठक बुलाकर पात्र पत्रकारों का चयन करवाते। लेकिन इस मामले में तिलभर भी आगे बढ़े बिना उन्होंने दो साल गंवा दिये और अंततः रिटायर भी हो गये।
वर्ष 2021 में स्व. राप्रसाद बहुगुणा स्मृति राज्यस्तरीय पुरस्कार हेतु पत्रकारों की तीन श्रेणियों के लिए सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा आवेदन/प्रस्ताव मांगे जाने पर वरिष्ठ पत्रकार की श्रेणी में 24, प्रौढ़ पत्रकार के लिए 15 तथा युवा पत्रकार हेतु 10 आवेदन/प्रस्ताव भी प्राप्त हुये थे। इन पुरस्कारों में वरिष्ठ पत्रकार को 2 लाख 51 हजार, प्रौढ़ पत्रकार को एक लाख 51 हजार और युवा पत्रकार को एक लाख 25 हजार का नगद पुरस्कार प्रदान करने का प्राविधान है लेकिन प्राप्त आवेदनों पर कोई निर्णय न होने से वह आज तक सरकारी फाइलों में धूल फांक रहे हैं।
वर्ष 2022 में स्व. राप्रसाद बहुगुणा स्मृति राज्यस्तरीय पुरस्कार चयन समिति में नामित होने के बाद मैं लगातार यह कोशिश करता रहा हूँ कि मुख्य सचिव जो स्व. राप्रसाद बहुगुणा स्मृति राज्यस्तरीय पुरस्कार चयन समिति के पदेन अध्यक्ष हैं, 6 सदस्यीय चयन समिति की बैठक बुलायें। इस संबंध में 25 मार्च, 2023, 14 जुलाई, 2023 तथा 27 दिसंबर, 2023 को मैनें तीन-तीन पत्र मुख्य सचिव को भेजे। जबकि 21 अक्टूबर, 2023 और 27 दिसंबर, 2023 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भी इस बावत पत्र भेज कर पुरस्कार चयन समिति की बैठक बुलाने का आग्रह किया गया था। व्यक्तिगत रूप से भी मैने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर उनके सम्मुख इस मामले को रखा था। 31 जुलाई, 2023 को सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा भी सूचना अनुभाग के अनु. सचिव को बैठक के बावत पत्र भेजा गया । लेकिन इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं हुई।
जिस कारण अब समिति का गठन और उसमें नामित होना अब बेमानी सा लगने लगा है। क्योंकि राज्य बनने के बाद केवल एक ही बार वर्ष 2016 में अल्मोड़ा के पत्रकार दयाशंकर टम्टा को 51 हजार का यह पुरस्कार प्रदान किया गया था. तब से आज तक किसी भी पत्रकार को यह पुरस्कार नहीं मिला है. जबकि पुरस्कार राशि तीन गुना बढ़ाने के साथ, पुरस्कार भी तीन कर दिये गये हैं. अब सवाल उठता है कि पत्रकारों का हक मारकर किसी को क्या हासिल हो रहा है? यह मेरी समझ से परे है।
अब जब उत्तराखण्ड की पहली महिला मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने पदभार संभाला है तो उनकी कार्यशैली के दृष्टिगत फिर एक उम्मीद जगी है कि शायद 30 मई, 2024 के हिंदी पत्रकारिता दिवस से पूर्व पत्रकारों के लिए कुछ अच्छी खबर आ जाये।
