नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को फिलहाल स्थगित कर राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर पीछे नहीं हटने का दावा करने वाले दीपके ने अचानक अपने समर्थकों से त्योहार के दौरान परिवार के साथ समय बिताने और घर लौटने की अपील की। उनके इस फैसले के पीछे तीन संभावित वजहों की चर्चा हो रही है—आंदोलन पर उठते सवाल, जेल में बंद सहयोगियों को राहत दिलाने की रणनीति और जनसमर्थन में कथित कमी।
क्या आंदोलन पर लग रहे आरोपों से बढ़ी चिंता?
अभिजीत दीपके के आंदोलन को झटका लगने की एक संभावित वजह उनके कुछ समर्थकों और सहयोगियों की टिप्पणियों को माना जा रहा है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की प्रमुख नेहा बोरा और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की ओर से कथित तौर पर रेजीम चेंज और बांग्लादेश के जेन-जी आंदोलन से सीख लेने की चर्चा ने आंदोलन की दिशा पर सवाल खड़े किए। राजनीतिक विश्लेषण के तौर पर माना जा रहा है कि ऐसे बयानों से आंदोलन के मूल मुद्दे से ध्यान भटकने और उसके उद्देश्यों पर संदेह पैदा होने की आशंका रही होगी। हालांकि, दीपके ने आंदोलन स्थगित करने के पीछे इस वजह की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
क्या सौरभ दास और आशुतोष रांका को राहत दिलाने की रणनीति है?
आंदोलन रोकने के फैसले को एक संभावित रणनीतिक कदम के तौर पर भी देखा जा रहा है। सौरभ दास और आशुतोष रांका के जेल में होने के बीच दीपके का यह ऐलान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने सुनवाई के दौरान दोनों को रिहा किए जाने पर दोबारा कानून का उल्लंघन न होने को लेकर आशंका जताई थी। ऐसे में यह अटकल लगाई जा रही है कि आंदोलन को फिलहाल रोकने का संदेश देकर दीपके ने अपने सहयोगियों की रिहाई की संभावनाओं को बेहतर बनाने की कोशिश की हो। हालांकि, आंदोलन स्थगित करने और दोनों सहयोगियों की रिहाई के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल एक संभावित राजनीतिक रणनीति के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
क्या कमजोर पड़ रहा था आंदोलन का जनाधार?
आंदोलन रोकने की तीसरी संभावित वजह अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिलना हो सकती है। खबर के मुताबिक, 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर बड़े प्रदर्शन की घोषणा के बावजूद सड़कों पर उतरे लोगों की संख्या संगठन की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रही। वहीं, 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम को लेकर भी समर्थकों की भागीदारी पर सवाल उठाए गए। इसके उलट, 20 जुलाई को सीजेपी के ‘संसद चलो’ मार्च में युवाओं की बड़ी भागीदारी का दावा किया गया था। ऐसे में हालिया कार्यक्रमों की तुलना में समर्थन कम दिखाई देने की चर्चा ने संगठन की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं। अगर आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन नहीं मिल रहा था, तो उसे कुछ समय के लिए रोकना संगठन के लिए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने का अवसर हो सकता है। हालांकि, भीड़ के आंकड़ों के आधार पर आंदोलन की लोकप्रियता के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
आगे क्या करेंगे अभिजीत दीपके?
फिलहाल आंदोलन स्थगित करने के फैसले के पीछे की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं है। यह कदम विरोध प्रदर्शन को नई रणनीति के साथ दोबारा शुरू करने की तैयारी हो सकता है, सहयोगियों को राहत दिलाने की कोशिश हो सकती है या फिर जनसमर्थन की स्थिति का आकलन करने का अवसर। अभिजीत दीपके ने अपने फैसले के पीछे इन संभावनाओं की पुष्टि नहीं की है। ऐसे में आने वाले दिनों में संगठन की गतिविधियां और नेतृत्व के अगले कदम यह तय करने में अहम होंगे कि आंदोलन केवल अस्थायी रूप से रुका है या उसकी रणनीति में कोई बड़ा बदलाव होने जा रहा है।
