डोईवाला से रहे प्रदेश में दो-दो सीएम, बदले में मिला पलायन का दंश

डोईवाला से रहे प्रदेश में दो-दो सीएम, बदले में मिला पलायन का दंश

देहरादून। राजधानी देहरादून से सटे डोईवाला विधानसभा में भी पूरे उत्तराखण्ड के साथ ही पलायन चरम पर है। ये वो डोईवाला विधानसभा है जहां से दो-दो सीएम हुए। डोईवाला विधानसभा की बात करें तो ये एक ओर ये क्षेत्र राजधानी देहरादून से आंख-से-आंख मिलाकर बात करता है तो इसका दूसरा छोर टिहरी जिले से सटा हुआ है जो पलायन की मार झेलने को मजूबर है। सत्ता में बैठे जिम्मेदार डोईवाला का हवाई अड्डा और लच्छीवाला का फ्लाईओवर दिखा क्षेत्र की जनता को विकास का सब्जबाग दिखाते है लेकिन सच्चाई बिल्कुल इसके उलट है।

डोईवाला विधानसभा का क्षेत्र की प्रदेश की अस्थायी राजधानी से महज 30 किलोमीटर के फासले पर है। लेकिन विकास के मामले में ये फासला सदियों का नजर आता है। प्रदेश के दूसरे पहाड़ी इलाकों की तरह यहां के गांवों में ना तो अच्छी शिक्षा के साधन है और ना इलाज के लिए अच्छा अस्पताल है। हालात ये है कि गांवों के नौनिहालों को मीलों पैदल चलकर स्कूल जाना होता है। तमाम ऐसे गांव हैं जो विकास की आभासी लहर के बाद भी सड़क सुविधा से वंचित है।

डोईवाला विधानसभा क्षेत्र के हल्द्वाड़ी, लड़वाकोट, चित्तौर, सनगांव, नाहींकलां, बड़कोट, सिंधवाल गांव, पलेड सहित कई गांव हैं, जहां सड़क नहीं है। बच्चों को स्कूल के लिए प्रतिदिन 16 किमी. चलना पड़ता है। ग्रामीण तो कहते हैं, पलायन हो रहा है। उनका यह भी कहना है, अगर यही हाल रहा तो गांव खाली हो जाएंगे। जब स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, परिवहन, बिजली, पानी और आजीविका के संसाधन नहीं होंगे तो गांव छोड़कर शहर की ओर जाना मजबूरी का पलायन है।

स्थानीय ग्रामीण कहते हैं कि बुनियादी सुविधाएं और आजीविका के संसाधन उपलब्ध हो जाएं तो कोई अपना घर-गांव खाली करके क्यों जाएगा। वे कहते है कि राजनीतिक दल पहाड़ों का विकास नहीं चाहते हैं। जब गांव खाली हो जाता है, तब विकास होता है। इनका मकसद गांव खाली हों, पहाड़ खाली हों, बाद में प्रापर्टी डीलिंग के माध्यम से कौड़ियों के भाव जमीनें खरीदकर विकास करना है।

उत्तराखण्ड में पांचवी दफा विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। 14 फरवरी को यहां पर पांचवी विधानसभा के इलेक्शन होने हैं। प्रदेश के दूसरे इलाकों की तरह राजनीतिक दल डोईवाला की तकदीर और तस्वीर बदलने का वायदा करने एक बार फिर जनता के बीच में है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा विकास को लेकर जनता के बीच में है, तो वहीं विरोधी कांग्रेस भ्रष्टाचार, महंगाई के खिलाफ जनता से वोट मांग रही है। 2012 में डोईवाला विधान सभा अस्तित्व में आई। तब से यहां स्थानीय जनता ने कांग्रेस और भाजपा के नुमांइदों को विधानसभा भेजा। कांग्रेस से हीरा सिहं बिष्ट यहां की विधानसभा में नुमाइंगी कर चुके हैं वहीं भाजपा की ओर से यहां की जनता पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक और पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत को विधान सभा भेज चुके हैं। खास बात ये है कि ये तीन पैराशूट कैंडीडेट रहे।

निर्दलीय प्रत्याशी और भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष जितेन्द्र सिंह कहते हैं डोईवाला का विकास इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि भाजपा-कांग्रेस ने हमेशा यहां पैराशूट उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा। इन लोगों ने महज यहां से अपना राजनीतिक फायदा उठाया। विकास के नाम पर हमेशा भाजपा-कांग्रेस ने ठगी का काम किया है। वे कहते हैं डोईवाला का विकास सही मायनों में तभी हो सकता है जब स्थानीय जनप्रतिनिधि विधानसभा में हो। और इसी मकसद से वे स्थानीय लोगों की भावनाओं के मुताबिक निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे हैं।

 

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