अतिक्रमण हटाओ अभियानः वीरानगी और बेचारगी

अतिक्रमण हटाओ अभियानः  वीरानगी और बेचारगी

मनोज रावत

गोण्डार भ्यूंडार अभियान के जनसंपर्क कार्यक्रम में था ही कि, पता चला कि मेरी विधानसभा के कुण्ड से लेकर भीरी तक के सड़क किनारे के अस्थायी ठिकानों को बेरहमी से उजाड़ दिया है।

दुनिया के किसी भी हिस्से की यात्रा में कुछ जगहें ऐसी होती हैं जंहा पर खुली केवल एक दुकान राहगीरों को यात्रा का हौसला देती है। ऐसी ही दुकान कुण्ड के गुलाब सिंह- शोभन सिंह जी (पठाली वाले) की दुकान थी। केदारनाथ यात्रा मार्ग पर गुप्तकाशी और ऊखीमठ जाने वाले लोगों के लिए ये दुकान इस सुनसान जगह पर एकमात्र आशा का केंद्र थी। सालों पहले जब बिजली नहीं आती थी तो उनकी लालटेन की टिमटिमाती रोशनी आने-जाने वालों की थकान खत्म कर देती थी। इसी स्थान पर उनकी सैकड़ों भेड़-बकरियां रहती थी उनकी मिमियाने की आवाज के बीच उनके मावे के पेढो का स्वाद हर किसी को याद होगा। अब उनके बेटे यात्रियों की सेवा कर रहे हैं।

आज सबसे पहले कुण्ड पंहुचा तो वहा अंदर तक डरा देने वाली वीरानगी छाई थी। पीढ़ियों से चली आ रही गुलाब सिंह- शोभन सिंह जी की दुकान प्रशासन ने या डरा कर उनके ही बेटे ने उजाड़ दी थी। पहले 2011 की आपदा में भी यह दुकान उजड़ी थी। मुझे जंहा तक याद है उनकी इस जगह पर लीज थी। अतिक्रमण हटाने वाले किसी अधिकारी ने उनके कागजात नहीं देखे होंगे उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं थी। प्रशासन के सर पर जब उच्च न्यायालय का भय सवार हो और सरकारें अपनी जनता को बचाने में रुचि नही ले रही हों तो ऐसी ही बेचारगी छाएगी।

उससे आगे काकड़ा गाड़ से पहले कॅरोना में वापस आ कर छभ् के सीमा से बाहर पठाली के 10-12 लड़कों ने अस्थाई ढाबे बनाये थे। उनमें से एक कि लीज की जमीन भी थी बाकी जमीन गांव की वन पंचायत की जमीन थी। इस सभी ढाबों को उजाड़ दिया है। इनमें से कुछ युवा होटल मैनेजमेंट का डिप्लोमा कर कॅरोना से पहले बैंगलोर नौकरी करते थे और अब अपने गांव में रोजगार कर रहे थे। उनका दर्द था कि प्रशासन ने उनको समान निकालने भी नही दिया। एक युवा ने समान निकालने का आग्रह किया तो उसको पीटते हुए थाने और तहसील ले गए उस पर आधी इंडियन पैनल कोड की धाराएं चिपकाना रहे थे। परंतु उन्हें भी पता है कि अब ये संभव नहीं है, फिर रात को उसे जमानत दे दी। इन युवाओं में से एक युवा के 80 साल के बूढ़े पिता मुझे बताया कि, कैसे एक कनिष्ठ राजस्व अधिकारी जब वे अपने बच्चे को छुड़ाने गए तो तहसील में उन्हें घंटों बेइज्जत करता रहा। राज्य के बड़े हिस्से में राजस्व पुलिस के इलाकों को भले ही रेगुलर पुलिस को दे दिया गया हो परंतु इन राजस्व कार्मिकों की जनता को बिना बात में धमकाने-गलियाने की आदत नही गयी।
आगे काकड़ा गाड़ में भी 2 दुकानें तोड़ दी थी। भीरी में अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति का कहना था कि, साहब मेरे नाम पर 1 मुट्ठी भूमि है। यंहा बड़े-बड़े लोगों के अतिक्रमण हैं। मुझे पता है कि किसने, कितनी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है सबको छोड़कर हम गरीबों के रोजगार को ही तोड़ा गया।

इनमें से हर मामला अलग है पर सबको एक ही लाठी से हांका जा रहा है।

सरकारों और प्रशासन की नीयत प्रदेश भर में साफ लग रही है। कार्यवाही पर उच्च न्यायालय का ख़ौफ़ साफ दिख रहा है। जिलाधिकारी को जिम्मेदार बताने से उनके डंडे से निचले अधिकारी गरीब को बरबाद कर रहे हैं। अमीरों के आका तो सभी होते हैं। सरकार ने कुछ दिनों पहले उपजिलाधिकारीयों के तबादले किये हैं परंतु उनको नए स्थानों पर नही भेजा है। शायद सबको उजाड़ने के बाद नए जमाने के हाकिमों को पुरस्कृत कर विदा करेंगे और नए वाले उपजिलाधिकारी सारा दोष पुराने उपजिलाधिकारी के सर मड़कर कल्याणकारी राज्य में राज करेंगे।

(इन पंक्तियों के लेखक पूर्व विधायक मनोज रावत हैं)

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